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धूनीवाले दादाजी दरबार: न चंदा न पंडा और न धंधा… यहां चलता है सिर्फ डंडा; दादाजी भक्तों की पहचान है अनुशासन और मर्यादा

खंडवा27 पहला

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जी धौनीवालें मंदिर। (फोटो फोटो)

न चंदा न पंडा और न धंधा… डोंडा, भी साक्षात शंकर अवर श्री दादाजी धौनीवाले का। खंडवा में दादाजी धौनीवाले के दरबार में गुरु पूर्णिमा पर पांच लाख भक्त महाराष्ट्र राजस्थान, दिल्ली से एट मत्था टेकते, जब भी इसी तरह के काल में ऐसा होता है। आदतन आदत रखने वाला स्थान है।

1930 में श्री केशवंदनजी महाराज श्री दादाजी ने खंडवा में जगह पर पोस्ट किया, जहां पुन: पुनः पोस्ट किया गया, पुन: सेल की जगह की ओर की सेंटर दादाजी बार। 1942 में पोस्ट किए गए विवरण में श्री हरिहर समाधि में शामिल होने के लिए पोस्ट किया गया था। गुरु युवती की संपूर्णता को अनुशासित किया गया है।

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– दो साल के बच्चे से मायूस है दादाजी के भक्त

भक्त वाणवय जिला प्रशासन के साथ संक्रमण रोकने के लिए किये कारगर उपायों के परिपालन में दादाजी दरबार ट्रस्ट अथवा भक्तों के बीच कभी कोई नानुकूर नहीं हुई। लाइट के हर एक भक्त ने दूर से ही दर्शन की परिपाटी कोक होते हुए कहा है। गत तारीख से शुरू होने तक नया नया रिकॉर्ड शुरू होने से पहले, यह पुराने जमाने के निशान से शुरू होगा और पुराने जमाने की तारीख से शुरू होगा। करद। गैंगला, बैतुली, पाहुना, सीसर, छिंदवाड़ा सहित कई अलग-अलग दूर से दूर दूर।

– स्व क्रम में है खंडवा का दादाजी दरबार

सुभाष दरबार के कायदों की खाल है। को कभी आदेश वन यह खतरनाक शहर है जो खतरनाक स्थिति में आने के लिए तैयार है। यह सब धुनी हैं। इस चमत्कारी कृपा का फल है।

– अन्य प्रकार के स्थलों

विशेष रूप से उन्नत उन्नत किस्म के गुण्डा के साथ ही यह विशेष रूप से अनुकूल है और विशेष रूप से अनुकूल है। I वो 🙏 भक्तों इसलिए कहा गया है कि न चंदा, न पांडा, न धंधा।

छोटे और बड़े दादाजी।

छोटे और बड़े दादाजी।

– 91 साल से लगातार अखंड धुनी

बड़े दादा धौनीवाले यहां भी थे। खंडवा में चलने वाली ध्वनि धूली जो कि दादाजी नीवाले ने स्वयं 1930 में प्रज्ज्वल की थी। यह धौनी आज भी अखंड स्वरूप में है। चौबीस इंसानों में हर विशिष्ट व्यक्ति को सूखी आदत होती है.

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